Tuesday, 7 July 2015

मम्मी की डायरी (काहानी)

मम्मी की डायरी

अपनी जननी मैं आज तक सिर्फ मॉम , मम्मी या म्मा ही समझती आई हु।
उनके माँ होने का या यूं कहु के माँ शब्द का अर्थ मैने आज जाना हैं,   आज जब वो मेरे 21 वर्ष के जीवन में पहली बार घर पर नही हैं और मुझे मेरे कुछ जरूरी सामान न मिलने पर उनपे खीज हो रही हैं।
अक्सर मम्मी मेरे सामान को जहा मैं रखती हूँ  वह से उठा कर इधर उधर रख देती हैं।
अभी मुझे मेरी मनी  बैग  नही मिल रही हैं
कितनी बार मैने उनसे बोला हैं की मेरी चीज़ो को वो हाथ न लगाया करे,
जो जैसे रखा हैं उसे वैसा ही रहने दिया करे
अपनी स्टोर मेनैजमेंट की डिग्री वो अपनी रसोई और घर के बाकि जगह तक रखे,  लेकिन मेरे कमरे मे अप्लाई ना करे।    लेकिन वो समझती ही नही हैं ।
मनी बैग न मिलने पर मैने सोचा मम्मी की अलमारी से ही कुछ पैसे लेलु
मैं मम्मी के कमरे में गई। आज से पहले मैं उनके कमरे में कब गया थी मुझे याद नही ।   
जब मैने अलमारी खोली तो मेरी नज़र ऊपर वाले खाने में पड़ी एक डायरी पर गई
डायरी की हालत बता रही थी की ये कितनी पुरानी हैं । इस डायरी में मेरी कोई दिलचस्पी नही थी।
मैने इसे वापिस वही रखने के लिए उठाया तो उसका एक पीला हो चुका पेज जमीन पर गिर गया ।
मैने वो पेज रखने के लिए डायरी को खोला। .... उसे खोलते हुए मैं सोच रही थी की पता नही मम्मी को पुरानी चीज़ो से लगाव हैं या वो कंजूस ही इतनी हैं की इन्हे बदलना नही चाहती हैं।  इस अलमारी के बदलने को  ले कर मम्मी और पापा का झगड़ा भी हो गया था । तब  मम्मी को इतना कहते सुना था की आप चाहे तो अपनी नई अलमारी ले आये पर मैं ये अलमारी नही बदलूंगी,  मेरी माँ ने ……। मेरी माँ ने.......
ये शब्द कहते कहते उनकी आँखे भर आई थी उनकी हमेशा सूनी पड़ी आँखे जैसे बाढ़ से भरी नदी की तरह अपने किनारे तोड़ने को तैयार थी ।
उस वक्त पापा ने एक शब्द भी नही कहा जैसे वो समझ गए हो की यदि ये बाढ़ आ गई तो उसे रोक पाना मुश्किल होगा।
पूरे घर में सबसे खास सामान थी ये अलमारी मम्मी के  लिए।

डायरी का वो पेज रखने के लिए मैने जब डायरी को खोला तो मेरी नज़र कुछ लाइन्स पर पड़ी
"तुम्हारी बहुत याद आती हैं माँ.... पर मेरी बेटी को ये सब फील नही होगा ।
जिंदगी जिने के आपने आंदज़ में मैं इमोशनल नही हूँ पर ये शब्द मेरे भीतर तक उतर गए अब मेरी दिलचस्पी पैसों मे नही थी , लगातार बजती  फ़ोन की घंटी  में नही थी। आस पास से आती बाकि आवाजे मैं सून कर भी नही सून पा रही थी।  अब तो मैं बस  इस डायरी में लिखे माँ,  मेरी बेटी , और मैं को जानना चाहती हूँ ।  कौन हैं ये तीनो, कौन किसे लिख रहा हैं।  वो माँ, मेरी बेटी,  मैं किसके लिए प्रयोग हुए हैं ।  मैं वही मम्मी के बेड़ पर बैढ गई  और संभालते हुए डायरी को पढ़ना शुरू किया ।
किसी हो माँ आज तुम्हारी नातिन सात दिन की हो गई हैं, एक बेटी पा कर ऐसा लग रहा हैं जैसे तुम भगवान के घर से वापिस आ गई हो।   जैसे तुमने मुझे पला हैं माँ, मैं अपनी बेटी को उससे भी अच्छी तरह उससे भी ज्यादा लाड प्यार से पालूंगी।  

माँ तुम्हारी नातिन एक साल की हो गई हैं , काले सुनहरे बाल हैं, बड़ी बड़ी बड़ी आँखे हैं,
गुलाबी होठ हैं, छोटी सी नाक हैं, बिलकुल परी जैसी हैं मेरी बेटी।  जानती हो माँ इसकी भोली सी शरारते मुझे बड़ी प्यारी लगती हैं, खड़े होने की कोशिश करते ही गिर जाती हैं, और जैसे ही गिरती हैं इसकी आँखे मुझे खोजने लग जाती हैं । मेरा दिल दौड़ कर इसके पास पहुंच जाता हैं। कभी कोई खरोच भी ना आये मेरी परी को।
बहुत कोशिश करने का बाद आज मेरी बेटी ने म...... मम्म ……… शब्द निकला हैं ।
मैं उसे माँ कहना सिखा रही थी।
7 साल हो गऐ माँ ... मेरी बेटी बड़ी हो रही हैं
जैसे जैसे बड़ी हो रही हैं इसकी दादी ने इसके फ्रॉक पहनने पर एतराज शुरू कर दिया हैं
पर मैं उनकी नही सुनूँगी, मेरा जो दिल करेगा मैं उसे वही पहनाँऊगी।
याद हैं न तुमको जब तुमने मेरी फ्रॉक सिल्वाई थी तो पिताजी ने वो फ्रॉक फाड़ दिया था 
तुम्हे ये भी कहा था की लड़की को कैसे पला जाता हैं ये तुम नही जानती हो । उस वक़त तुम्हारी हिम्मत नही थी कुछ भी कहने की । लेकिन मुझे किसी से भी लड़ना पड़ा तो मैं लड़ूंगी माँ ।
अपनी बेटी के अधिकारों के लिए उसे संबलम्बी और आत्मविश्वाशी बनाने के लिए मैं कुछ भी करूंगी
मेरी परी हाई स्कूल जाने लगी हैं माँ ।
समय की थोड़ी कमी हो गई हैं, दुनिया तेज़ी से बदल रही हैं ना माँ, इसलिए ......
जब मैं तुम्हारे साथ खेत मैं जाती थी , रात को तुमसे चिपक कर सोती थी तब तुम्हारे अलावा मेरी कोई और दुनिया नही थी। लेकिन मेरी बेटी के साथ अनेक दुनिया जुड़ चुकी है, उसके स्कूल की दुनिया ,उसके दोस्तों की दुनिया,  कंप्यूटर की दुनिया, मार्किट में घूमने की दुनिया, वट्सप्प की दुनिया और सबसे बड़ी उसके आपने कमरे की दुनिया हैं।  अब हम लोग सिर्फ खाने की टेबल पर मिलते हैं। बस मैं तभी पूरी कोशिश करती हूँ उसके मन की सुनने की और अपने मन की सुनाने की।
स्कूल से आते ही नजर तुम्हें देखकर सुकून पाती थी माँ, लेकिन जब मेरी बेटी कॉलेज से लौटकर आती है और सीधी अपने कमरे में चली जाती है तब मुझे तुम्हारी याद आती है।
क्या रिश्तों के मायने समय के साथ बदल जाते हैं या समय रिश्तों के मायने बदल देता है।  इस सवाल का जबाव नहीं मिल रहा है मुझे,  जब मैं कोई गलती कर देती थी या तुम मुझे कुछ समझाती थी तब कहती थी तुम दुनिया नहीं समझती लाडो, ऐसा नहीं करना वैसा नहीं करना ये करना वो करना है।
आज मेरी बेटी मुझे समझाती है कि मैं नहीं समझती हूँ वो अच्छी तरह जानती है क्या ठीक है क्या गलत है। कितनी अजीब बात है न माँ जब मैं बच्ची थी तब भी नहीं समझती थी औऱ आज माँ बन गई तब भी नहीं समझती। तुम मेरी जिन्दगी का हिस्सा थी माँ,  लेकिन मैं अपनी बेटी की जिन्दगी का तो क्या, उसके एक दिन का भी हिस्सा नहीं बन पाई।

अपने कपड़ो, चप्पल, हेयर पिन्स, रिबन, सकार्फ, आदि सभी जरुरत की चीजों के लिए मैं तुम पर ही तो आश्रित थी। कुछ नई चीजें मंगवाने के लिए तुम्हें मनाना डाट खाना औऱ मेरी जिद के सामने हार कर तुम्हारा वो चीज ला देना। पर हम दोनों के बीच ऐसा रुठना नहीं होता माँ।
शादी करके तुमसे दूर जाना एक बात थी लेकिन तुम्हारा दुनिया से ही चले जाना.........
तुम्हारे जाने के चार महीने बाद ही मेरी परी मुझे मिल गई उस वक्त ऐसा लगा जैसे मैंने तुम्हारा साथ दोबारा पा लिया है माँ।  अगर मेरी बेटी ना मिलती तो शायद मैं जी ही नहीं पाती ।
लेकिन अब फिर से मैं अकेली होती जा रही हूँ। तुम्हारी याद दिनों दिन बढ़ती जा रही है माँ।
तुमने मेरी शादी के समय जो अलमारी खुद बनवाकर दी थी, मैं खुद को उसके अधिक करीब महसूस कर रही हूँ। आज उन्होंने इस अलमारी को बदलने की बात कही ,उन्हें शब्दों में कैसे बताउँ कि ये सिर्फ एक अलमारी नहीं है इसमें मेरी माँ दिखती है मुझे...... तुम दिखती हो माँ......
आज मेरी बेटी के कुछ दोस्त घर आए थे माँ, पहली बार । वैसे तो कभी वो किसी को घर नहीं लाती पर आज पता नहीं सब दोस्त आए थे। उसने मुझे पहले ही कह दिया था कि उसके दोस्तों के सामने मैं उसके कमरे में बार बार न जाउँ और न ही ओवर केयरिंग मदर की तरह बिहेव करुं।
मैंने खाना बनाने के लिए कहा तो उसने बताया उन्होंने बाहर से खाना मंगवाया है । जब घर ही आए हैं सब, तो मैं घर पर ही अच्छा सा खाना बना देती। अब भी बाहर का खाना खाओगे तो घर और बाहर में फर्क ही क्या रहा, मैंने कहा।
उसने बड़ी ही झुझलाहट के साथ जवाब दिया Mom please don,t interfere in it and do your work please let us enjoy  और आपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया
दरवाजे के बंद होते ही तेज़ म्यूजिक बजा ।
शायद सब नाचने लगे थे। थोड़ी देर बाद आर्डर किया खाना लेकर एक लड़का दरवाजे पर खड़ा था। मैने उससे खाने के डिब्बे लिए , साथ साथ उसने मुझे एक कार्ड देते हुए कहा happy  birthday card है मेम, आप प्लीज जिनका बर्थडे हैं उन्हे देदेना  thank you .  ये कह कर वो लड़का तो चल गया पर मैं........

मैं वही असुबध खड़ी रह गई ।
21  सालो में पहली बार ये मुझसे क्या हो गया, मैं अपनी परी का जन्मदिन भूल गई ।
उस परी का जिसके लिए मैने मन्नते मांगी थी की भगवन मुझे एक बेटी जरूर देना,  उसका जिसके लिए मेरी साँस से हर रोज लड़ाई होती थी की मेरी बेटी का लालन पालन कैसे होगा, जिसके लिए हर जन्मदिन पर मैं मंदिर जाती थी , घर पर सबके लिए खीर बनती थी ।
जिसमे मैने हमेशा तुम्हारी कमी को पूरा करने की कौशिश की हैं मैं उसी का जन्मदिन भूल गई।
मैं जैसे ही पलटी वो मेरे सामने खडी थी। मेरी आँखों में प्यार और पछतावे के आँसु आ गए, मेरा जी कर रहा था की अपनी बेटी को कस कर गले लगा लू, उसकी सारी बलाँए खुद पर लेलू। कमरे से म्यूजिक की आवाज और तेज़ आने लगी थी  वो झूमते हुए मेरे पास आई और खाने के डिब्बे ले कर चलने लगी। bday  कार्ड देख कर उसके चेहरे की चमक और भी बढ़ गई ।
उसने वही से आपने दोस्तों को पूकारा hey guys… look at this , isn’t it sweet I love it.  आज तक उसकी माँ जो कुछ करती थी वो स्वीट नही था माँ?    हो सकता हैं वो इसलिए भी खुश हो की इस बार उसकी माँ ने अपनी मंदिर के प्रसाद  की, खीर की formalities नही की थी।
जैसे की वो हमेशा कहती थी-- मम्मी प्लीज ये सब ना आप मेरे साथ मत किया करो ।
माँ जब मैं अपनी बेटी के  मन में  बस ही नही पाई ,कभी उसकी माँ ही नही बन पाई तो मुझे शिकायत करने का भी कोई हक़ नही हैं ।
 बेटी :  डायरी खत्म होने में आखरी पेज बचा था अब मैं ये अच्छी तरह जान चुकी थी कि  जो लाइन्स मेने पढ़ी थी उनमे मैं , मेरी बेटी, और माँ कौन थी ।
इतना ही नही  इस डायरी में लिखे एक एक शब्द का मतलब उसमे छिपा दर्द भी मैं महसूस कर रही थी ।
एक ही घर में रह कर भी मैं कभी अपनी माँ को नही जान पाई , मैं अपनी माँ से इतनी आंजन क्यों रही
क्यों मैं कभी अपनी माँ की आँखे नही देख पाई।
कैसे उनसे उनकी बेटी को दूर रखा मैने  मैं अपनी माँ से आज तक जरूरत का रिश्ता निभाती रही
मैने वो आखरी पेज भी पलटा जिसपे लिखा था....
तुम्हारी बहुत याद आती हैं माँ , पर मेरी बेटी को अपनी माँ के लिए सब फील नही होगा
मेरे हाथ में मम्मी की डायरी थी  और सामने अलमारी ...
मेरी आँखे इस अलमारी में नानी को देखना चाह रही थी पर उन्हे तो सिर्फ मम्मी ही महसूस कर सकती हैं । मेरी बेचैनी बढ़ रही हैं
मैं मम्मी के सीने से लग कर रोना चाहती हूँ.... बहुत रोना चाहती हूँ
मम्मी दादी से मिल कर , चाची के घर से कब तक आएँगी ?
शाम होने तक का समय कट ही नही सकता...
एक एक पल में मेरी मम्मी से मिलने की ललक और बढ़ रही थी .....

आपने कमरे में जा कर मैने स्टडी टेबल से एक डायरी उठाई , उसके काफी पन्ने  भर चुके थे। । मैने वो सभी भरे हुए पन्ने फाड़ दिए , उस डायरी को फिर से कोरा बनाने के लिए, फिर से एक नई शुरुआत करने के लिए मैने वो भरे हुए useless पन्ने हटा दिए ।


आंसुओ से धुंधलाई आँखे लिए मैने उसमे लिखा  "माँ जल्दी घर आ जाओ तुम्हारी बहुत याद आ रही हैं"। 

No comments:

Post a Comment