Friday, 10 July 2015

पतझड

घर का सन्नाटा मुझसे बर्दाश नही होता।  दादी, छोटी , मम्मी और मैं सब होते हैं घर में , फिर भी ख़ामोशी हैं की टूटती ही नही।  सबको पता होता हैं किसे क्या करना हैं/ बिना पूछे बिना कहे सब अपना अपना काम करते रहते हैं।  न दादी और मम्मी की बहस होती हैं न छोटी मुझसे लड़ती हैं।  मम्मी हम सबकी हिम्मत बंधे रखने के लिए दिल खोल कर रो भी नही पाती हैं और ना ही आपके   आने का विश्वास जोड़ पाई हैं वो।
आँगन में खड़े आपने नीम के पेड़ और मम्मी में कई समानताये हो गई  हैं।  दोनों ही जीवन से उदास नजर आते हैं। दोनों में ही पतझड़ आया हुआ हैं।
दुनिया और समाज के लिए वो कोई श्रृंगार नही करती,  न ही बिंदी लगती हैं ,न सिन्दूर डालती हैं, न चमकीले कपड़े पहनती हैं।  हाथो में चार चार चूड़िया ही हैं। आपके आने का विश्वास वो सिर्फ अपनी इन्ही चूडियों में खोजती रहती हैं।  इस पतझड़ पर कभी बहार आ पायेगी ?
दादी। …… दादी को आपना जीवन बोझ लगने लगा हैं।  जितनी दुआ उन्होंने पापा के आने की नही मांगी हैं उससे ज्यादा बद्दुआ वो खुद को मरने की दे चुकी हैं।  घर  पर आने जाने  वाले हर किसी से पूछती हैं की भगवन ने उन्हें क्यों नही उठाया ?
घर की ख़ामोशी में मैंने कई बाते सुनी हैं।  सबकी बाते।  ये जुबान से कही गई बाते नही हैं बल्कि 
'आँखों से कही गई हैं। कभी तड़पती आँखों से , कभी तरसती आँखों से,  कभी रो कर सूजी हुई आँखों  से,  कभी आंसू के बाद भी सूखी से,  कभी पछतावे से भरी आँखों से,  झूठी हंसी भरती आँखों से, सहमी हुई आँखों से"।  मैंने आँखों के इतने रंग पहले कभी नही देखे थे।
नए जूते चाहिए। पुराने वाले फट गए हैं। नेशनल टीम के लिए सिलेक्शन मैच चल रहे हैं। मम्मी से कैसे कहूँ? पापा होते तो खुद ही ला देते।
अब खर्चो के बारे में सोचना पड़ता है। कौन सी चीज़ जरूरी है कौन सी चीज़ के बिना भी काम चल सकता हैं।  पर पहले ऐसा क्या था जो बिना कहे ही सबकी जरूरत पूरी हो जाती थी। बिना कोई हिसाब लगाये सबकी सभी चीज़े आ जाती थी।  पापा कैसे भी करके लाते, मगर ला ही देते थे।  
अब हालत बदल चुके हैं।
पहले घर में जो न देखा न सूना वो भी होने लगा हैं।  मम्मी और दादी कई बार किसी टोन टोटके वाले को घर बुला चुकी हैं।  उसके कहे टोने टोटके करने लगी हैं।
कभी पीले कपडे में कुछ बंधना होता हैं कभी लाल कपडे में , कभी चौराहे पर कुछ रखना होता हैं तो दादी रख आती हैं।
एक बार एक श्याने ने कहा  पापा ठीक से हैं।
किसी आश्रम में हैं।  अपनी यादाश्त भूल चुके हैं।
उसके ऐसा कहते ही हम सबका दिल जोर से धड़कने लगा था।  सबके दिल जैसे एक साथ यही दुआ मांग रहे थे की चलो वो ठीक तो हैं बस मिल जाये , घर आ जाए। हम सबके दिलो में जगी ये विश्वास की चमक आँखों में उतर आई थी।   इस सबका भी क्या होना था ? धीरे धीरे हमारी ये आस भी दम तोड़ने लगी।
दूसरी तरफ हर रोज एक नई आस फुटबॉल मैदान में जन्म लेती।  मेरे मन की आस।
हर रोज एक नई कहानी मेरे मन में बनती और वही ख़त्म भी हो जाती।
कभी ऐसा लगता जैसे मैं किसी दिन प्रैक्टिस से घर पहुँचूगा और पापा सबके साथ बैठे मिलेंगे।  मैं दौड़ कर उनसे लिपट जाऊंगा।  कुछ नही बोलूंगा बस रोता रहूंगा…… रोता ही रहूँगा.......
कभी मेरा मन कहानी बनाता की मैं कही घूमने  गया हुआ हूँ  और पापा अपनी यादाश्त खोये मुझे कही यू ही मिल जाये , मैं उन्हें याद दिलाऊ की मैं आपका बेटा पापा,   चलो न घर चलो.......
या कभी किसी हॉस्पिटल से कॉल आये....
हैलो ……
हाँ रवि बोल रहे हैं।
रवि मैं फंला हॉस्पिटल से डॉक्टर बोल रहा हु...
बेटे आपके पापा ठीक हैं।
वो कॉमा में थे तो इतने दिन तक हम उनका अता पता नही जान पाये अब वो ठीक हैं।  आप आकर उन्हें ले जाओ।
काश....काश...  कोई एक कहानी सच हो जाये? हो सकती हैं क्या?
कभी कभी मुझे मेरा जीवन बेचारगी भरा लगता हैं।
जब जब मेरे साथी खिलाड़ियों की आँखे , कोच की आँखे , पड़ोसियों की आँखे मुझे दया और हमदर्दी भरी नज़रो से देखती हैं तब तब मुझे खुद पर गुस्सा आता हैंकभी  रोना आता हैं।
छोटी सबकी आँखों को समझती हैं।
वो अब छोटी नही रही।  घर की छोटी से लेकर बड़ी  बात तक समझने लगी हैं वो।
बड़ी बहन बन चुकी हैं। उसका और मेरा झगड़ा भी नही होता , बहस नही होती , कहा सुनी नही होती। घर में एक निर्दोष सी उदासी बनी रहती है।  जिसे हटाने के लिए सब बेताब हैं। अभी तक मेरा ही बचपन नही गया और मेरी छोटी बहन बड़ी हो गई।
अब समझ आया यूं ही नही कहा जाता की लड़किया जल्दी समझदार हो जाती हैं।  अगले साल वो दसवीं की परीक्षा में बैठने वाली हैं।  तब पापा की जगह कौन लेगा?  जैसे पापा ने मुझे अच्छे नंबर आने पर बाइक गिफ्ट की थी ,वैसे ही छोटी से ये वादा कौन करेगा की अच्छे  नंबर आने पर उसे कोई गिफ्ट मिलेगा ?
आज पापा के जाने के पांच महीने बाद पड़ोसियों, रिश्तेदारो का हमदर्दी भरा मातम खत्म हो चुका हैं।
पुलिस भी अपना काम पूरा कर चुकी हैं, वो भी किसी पूछताछ के लिए नही आते।
म्रेरी समझ  में ही आया की लोग हमदर्दी में आ रहे थे या मातम मानाने।  हालात के सामने घुटनो के बल खड़े हम सब पूरी तरह पापा का मातम भी ना मना सके.. लोग आते और कहते की भगवान  सब ठीक करेंगे। …… भगवान  पर  भरोसा रखो।
भगवान.......
भगवान ने ही तो सब बिगड़ दिया।
भरोसा तो पापा ने मुझे खुद पर करना सिखाया था।  याद हैं मुझे वो दिन जब पापा ने मुझे लीग से हट कर चलने का विश्वास दिलाया था। चुनौंतियों का सामना करने की हिम्मत बंधाई थी।
पापा जानते थे  मुझे क्रिकेट खेलना पसंद था,  पर मैं फुटबॉल अच्छा खेल सकता हूँ।  अपने सभी दोस्तों के साथ मैं सिर्फ क्रिकेट खेलना चाहता था।  उस वक़्त उन्होनें ही मुझे समझाया था कि किस तरह मैं थोड़ी सी टेक्निक के साथ अपनी क्षमता का बेहतर इस्तमाल कर , क्रिकेट से अच्छा फुटबॉल खेल सकता हूँ।  मुझे दो बेट्स मैन और ग्यारह फिल्डर में नहीं बल्कि बाईस खिलाड़ियों में एक बाल पर अपने पैरों की कला दिखानी है।
मेरी पैरों से बॉल को नचाने की कला और डिफेन्सरस् के बीच से गोल दागने का अन्दाज ही मुझे एक अच्छा फुटबालर बनाता है। ये उनका विश्वास था। ये उनके विश्वास का ही कमाल था, कि मैं स्टेट लेवल खेल आया। वो भी पाँच गोल अकेले अपने नाम करके।
पापा के लौट आने का ऐसा ही विश्वास भगवान दे सकते हैं।
अगर दे सकते तो अब तक वो आ चुके होते।
नफरत है मुझे भगवान शब्द से। भगवान से। भगवान होते तो अपने भक्तों पर यूं अनहोनी न बरपाते। जीवनभर मैं केदारनाथ की बाढ़ को नहीं भूल सकता जिसने मुझे अनाथ बना दिया। नहीं भूल सकता मैं वो मंजर जिसने मेरे पापा को,  मेरे पापा जैसे  हजारों को निगल लिया। हमारे घर की खुशियाँ तो उसी दिन खो गई थी जिस दिन पहली बार टीवी पर बाढ़ की खबरें आनी शुरु हुई और उसके बाद से आज तक लगातार पापा का नाट रिचएबल आता फोन।
हर न्यूज चैनल पर दिखाई गई भीड़ में पापा का चेहरा खोजने की नाकाम कोशिशे, वहाँ जिन्दा बचे लोगों में बाढ़ में फंसे लोगों में, यहाँ तक की मरे हुए लोगों की लिस्ट तक में पापा का नाम पता करने की नाकाम कोशिश, कुछ नहीं भूल सकता मैं।
कहावतो में एक एक पल को एक एक साल जैसा कैसे कहा जाता है। ये मैं उन पन्द्रह दिनों में जान चुका था। मेरी जिन्दगी के सबसे मनहूस बेबस और लाचार दिन थे वो।
क्यों नहीं मैं उन्हें हेलिकॉप्टर लेकर उसी वक्त ढूंढने निकल सकता था? क्यों नहीं मैं सारी पुलिस फोर्स को उन्हें ढूंढने में लगा सकता था? क्यों नहीं मैं खुद वहाँ जा कर उन्हें ढूंढ कर ला सका? क्यों नहीं वो बाद में खुद लौट कर आए? इन सब सवालों का जबाव भगवान देंगे?
न्यूज चैनल के हर बार के तबाही के दृश्यों में ऐसा लगता मानो इसी लहर में,  इसी भूस्खलन में खड़े थे मेरे पापा। कोई प्लीज जाओ उन्हें निकाल लाओ! प्लीज भगवान मेरे पापा को भेज दो! मुझे नहीं जानना था किस सरकार ने क्या किया? किसने बाढ़ में फंसे लोगों की कितनी मदद की? इस विनाश के लिए कौन जिम्मेदार है? मुझे पानी में बहती लाशें, मिट्टी में गड़ी लाशें, ठिठुरती रातों में सिकुडते लोगों पर हो रही राजनीतिक बहस नहीं देखनी थी। मुझे तो एक झलक अपने पापा की देखनी थी।
बैंक से पापा की दी बाइक की किश्त के कई नोटिस आ चुके हैं पिछली पांच किश्ते नही गई हैं। मम्मी ने कहा हैं की उनकी इंश्योरेंस का जो पैसा आना हैं उसी से बाइक की सारी किश्त भर देंगी। मम्मी  के विश्वास की दिवार में दरार आ चुकी हैं।  उनका हौंसला कभी भी भरभरा कर गिर सकता हैं।  वो समझा चुकी हैं अब इंतज़ार करना बेकार हैं अच्छा होगा अगर वो जल्द ही घर में पापा की सारी जिम्मेदारियां संभाल ले।
पापा ने मुझे लीग से हैट कर चलना सिखाया था , आज मेरी लीग हट चुकी हैं पापा।
अब मुझे चलना हैं।
दौड़ना हैं।
फुटबॉल टीम में सेलेक्ट होना हैं।
नेशनल खेलना हैं।  आपको हमेशा जिन्दा रखने के लिए।






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